लाल कुर्सी, बारिश और कुछ पुरानी यादें


नमस्कार।

आज जब मैं कलम लेकर अपने आंगन में घर से वो लाल वाली पुरानी कुर्सी लेकर बैठा, जिसे बचपन में कभी पढ़ाई के लिए यूज करता था, तो लगा मानो वो लड़कपन, जब काम हो या ना हो, हाथ में कलम और एक डायरी लिए अक्सर बैठ जाना, वो वापस जीवंत हो उठा।

ज्यों ही मैंने कलम उठाकर कुछ लिखना चाहा, शुरू में तो लगा कि परम पूज्य श्री गणेश जी मानो आशीर्वाद दे रहे हों। ऐसे भी, अभी गणेश चतुर्थी का माहौल जो ठहरा। हवा मध्यम-मध्यम, आकाश में हल्के बादल और वातावरण एकदम पावन व प्रफुल्लित सा लगा।

लेकिन जैसे-जैसे कलम से स्याही दो लाइन लिखी, मानो स्वयं इंद्रदेव रुष्ट हो उठते हों। मेरे आंखों के सामने एक तीव्र कड़ी सफेद बिजली गिरी और बादल ऐसे गरजे कि मानो सारे भूलोक से क्रोध में कुछ आह्वान किया जा रहा हो। ठंडी-ठंडी मध्यम वायु अब तीव्र हो गई थी। इंद्रदेव अपने रौद्र रूप से प्रकृति को जगाने का आह्वान कर रहे हों मानो।

मैं तभी वो पुरानी लाल कुर्सी लिए अपने बुढ़ादा वाले कमरे में जा बैठा और इतने में ही वो बचपन के सारे छोटे-छोटे किस्से—जैसे बिजली और बारिश के समय टीवी और सारे स्विचेस का बंद करना, टीवी उड़ ना जाए इस बात से व्याकुल होना, कभी-कभार बारिश देखकर खुश होना—ये सारी यादें एक साथ मन में कौंध उठीं।

ज्यों ही इंद्रदेव को अपना प्रकोप थोड़ा कम किया, वह उस कुर्सी को वापस बाहर लेकर देखा, तो तुलसी के पौधे के चारों तरफ रखे गमले जमीन पर गिरे पड़े थे। घर के पीछे जाने वाले छोटे से रास्ते पे जल-जमाव हो पड़ा था। बारिश और उसके साथ की व्याकुलता मानो शांत हो गई, लेकिन वो शांति ठीक वैसी ही थी जैसे आपके मन में अपने किसी बड़े के निरंकुश डांट खाने के बाद होती है।

अब जब मैं सोचता हूं कि इस 20 मिनट के विकराल बारिश के बाद जनमानस में कैसी भावना होगी, तो निम्न चीजें मुझे याद आती हैं:

पहला, एक गृहणी जो दोपहर के खाने के बाद विश्राम कर रही होगी, सोनेवश शायद ही उसे कुछ प्रभाव पड़ा हो इस बारिश का।

एक परिवार जो छपरा मोड़ में वो बांस और प्लास्टिक बोरे से बनाए घर में रहता है, उन्हें भरसक ही उनकी छत ना जाए इस बात का निरंतर डर सताया होगा।

वह किसान जो शायद एक अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे थे, वो अत्यंत खुश रहे होंगे।

वो बूढ़ी अम्मा जिन्हें उम्र बढ़ने के साथ-साथ नींद घटना और चिंताओं के बढ़ने का अनुभव हो रहा है, उन्हें कपड़े उठाने की हड़बड़ाहट रही होगी।

और एक किसी घर के कोने में बैठा एक लेखक, जिसको मौसम दुर्लभ होने का आभास हो रहा होगा और साथ ही आंधी की वजह से हो रहे दिक्कतों का लेख लिखने का भी मन कर रहा होगा।

एक इकलौता कालखंड और उसमें हो रही सारी घटनाएं मानो पूरे समाज में एक ऊर्जा प्रदान करने का काम कर रही है। अब जब मैं लाल कुर्सी पर बैठकर जो लिखने आया था वो सोच रहा हूं, तो मानो वही भूल चुका हूं। क्योंकि इंद्रदेव हैं ही इतने मायावी।

तो आप भी चाय और पकौड़ों के साथ अपनी जगह की बारिश का आनंद उठाएं। नमस्कार।

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